देश में मानवाधिकारों और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के उल्लंघन गंभीर चिंता के विषय,
डॉक्टर सैयद खालिद कैस
मानवाधिकार कार्यकर्ता,लेखक
एक ओर जहां केंद्र सरकार ओर उसके मंत्री संत्री देश दुनिया में अपनी उपलब्धियों के बखान किए बगैर थक नहीं रहे वहीं दूसरी ओर विदेशी मीडिया और विदेशी सरकारों द्वारा हमारी व्यवस्थाओं पर हो रहे हमलों ने विश्व धरा पर हमारी छबि को धूमिल करने में कोई कसर नहीं की है। विगत 12वर्षों से देश में जो एक नई बयार चली है उसका असर 2014से आरम्भ होकर 2024तक स्पष्ट नजर आने लगा है।देश में जिन मुद्दों को लेकर वाद विवाद तर्क टिप्पणी देखने में आ रही है वह देश की एकता अखंडता भाई चारे को निगल रही हैं। केंद्र में बिराजी सरकार पूर्ववर्ती सरकारों पर जिन मुद्दों पर हमलावर होती थी आज जब उनके गिरेबान पर आता है तो वह आवाज दबाने के नित नए नए हथकंडे आजमाते नजर आते हैं। ऐसे ही एक मुद्दे पर गत दिनों सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस बी एन श्रीकृष्ण ने तल्ख टिप्पणी की जिसने सरकार को न सिर्फ आईना दिखाया वरन जनमानस को सोचने पर मजबूर कर दिया कि मंदिर मस्जिद हिन्दू मुस्लिम को छोड़ हमें उन ज्वलंतशील मुद्दों पर ध्यान देना होगा जो हमारे निजी जीवन से जुड़े हुए हैं।
दरअसल लोकतांत्रिक अधिकार और धर्मनिरपेक्षता संरक्षण समिति (सीपीडीआरएस) द्वारा आयोजित लोकतांत्रिक अधिकारों और धर्मनिरपेक्षता विषय पर एक राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस बी एन श्रीकृष्ण ने कहा कि देश में मानवाधिकार का मामला मुश्किल दौर से गुजर रहा है, क्योंकि उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालयों और निचली अदालतों में पांच करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं।
जस्टिस बी एन श्रीकृष्ण ने देश में मानवाधिकारों और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के उल्लंघन पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा, ”न्याय में देरी न्याय से इनकार है।” उन्होंने कहा कि असहमति और विरोध की आवाज उठाने का अधिकार लोकतंत्र की आत्मा है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए, कानून का शासन कायम रहना चाहिए और धर्मनिरपेक्षता का अर्थ अन्य धार्मिक विश्वासों को भी सहन करने की क्षमता होना चाहिए। उन्होंने वर्तमान संदर्भ में चिंता जताते हुए कहा कि भारत में अब मानवाधिकारों और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों जैसे प्रमुख मूल्य खतरे में हैं।”
पूर्व न्यायाधीश ने कहा कि पिछले 10 वर्षों से देश में न्यायिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को गंभीर खतरा है। उन्होंने कहा, ”नागरिक समाज को लोगों के अधिकारों पर हो रहे इन हमलों से लड़ने के लिए आगे आना होगा।”
इस अवसर पर सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य रिटायर्ड जज जस्टिस ए के पटनायक ने हिरासत में मौत, फर्जी मुठभेड़ और जेलों में यातना के मुद्दों को रेखांकित करते हुए कहा कि देश में लोकतांत्रिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार संस्थाएं ही इनका सबसे अधिक उल्लंघन कर रही हैं।हिरासत में मौतें, फर्जी मुठभेड़ और जेल में यातनाएं बढ़ने की घटनाएं बढ़ी हैं।”न्यायमूर्ति पटनायक यहीं नहीं रुके उन्होंने कहा, ”एक समतामूलक समाज के बजाय, संपत्ति कुछ लोगों के हाथों में केंद्रित हो रही है और जिस तरह से समाज विभाजित हो रहा है, मुझे लगा कि अब मुझे अपनी बात कहनी ही होगी।’’
लोकतांत्रिक अधिकार और धर्मनिरपेक्षता संरक्षण समिति (सीपीडीआरएस) द्वारा आयोजित लोकतांत्रिक अधिकारों और धर्मनिरपेक्षता विषय पर आयोजित इस राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री प्रशांत भूषण ने कहा कि भारत में मौलिक अधिकारों का बड़े पैमाने पर हनन हो रहा है। उन्होंने कहा, ”संवैधानिक संस्थाओं को नष्ट कर दिया गया है और कठोर कानून लागू किये गये हैं।” श्री भूषण ने कहा कि निर्वाचन आयोग और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक सत्तारूढ़ शासन के पिछलग्गू बनने के जीवंत उदाहरण हैं।
इस राष्ट्रीय सम्मेलन में जिन विषयों पर ध्यानाकर्षित कराया गया है उसका सीधा संबंध देश के जनमानस है। हमारे संवैधानिक अधिकारों पर हो रहे हमले चिन्ता का विषय है। देश की जनता को राजनैतिक दलों के बहकावे से दूर अपने मानव अधिकारों, संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण की ओर ध्यान केंद्रित करना होगा वरना आने वाले समय में हम अपनी संतानों से उनका भविष्य छीन लेंगे।वर्तमान समय में जिस प्रकार लोकतांत्रिक तरीके से चुनी सरकारें लोकतंत्र के मूल तत्वों को नष्ट करके निरंकुशता का उपयोग कर रही हैं वह चिंतनीय है।हमारे समाज को सामाजिक न्याय पर हो रहे हमलों सहित संवैधानिक अधिकारों पर हो रहे आघातों के प्रति सजक रहकर निष्पक्षता को बढ़ाना देना होगा तभी देश का उत्थान होगा।






